
महान गायक मोहम्मद रफी साहब को हम से बिछड़े चार दशक हो चुके हैं, पर अब तक उनकी आवाज़ का जादू बरकरार है। उनकी सादगी, ईमानदारी, उदारता और सरलता उनके सुर में इतनी ढल गयी थी कि उनके गीत से आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। इसीलिये सब उन्हें श्रद्धा से “रफ़ी साहब” कह के पुकारते हैं और “परमात्मा की आवाज़” कह पूजते हैं।
अहंकार, लोभ, द्वेष और राजनीति से अछूते, रफ़ी साहब की दानवीरता, लोक-कथाओं की तरह सर्वविदित है और यही उनकी आवाज़ की पाकीज़गी और पवित्रता का राज़ है। बहुतेरों कलाकारों को चुपचाप आर्थिक मदद करने वाले इस शालीन कलाकार ने ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से बात कर, इमरजेंसी में किशोर कुमार के गीतों पर लगे प्रतिबन्ध को हटवाया था। घटना के चश्मदीद गवाह मन्ना डे भी थे लेकिन ये बात रफ़ी साहब की मृत्युपरांत, किशोर कुमार ने रोते हुए बतायी थी कि दोनों कलाकारों से उन्होनें कुछ ना कहने का वचन लिया था! इसीलिये रफ़ी साहब की रचनाओं में किसी पीर-पैगम्बर-संत की तन्मयता महसूस होती है।
उनकी तीन सप्तक से लम्बी आवाज़ की विविधता, लोच, गहराई, ताकत और भाव्यात्मक अभिव्यक्ति की श्रेष्ठता को आज तलक, कोई गायक या गायिका छू भी नहीं पाया है। स्वर और लयकारी का गुण बहुतों के पास होता है पर शब्दों में करूणा, माधुर्य, थिरकन, जोश, कोमलता और रूहानीयत का सही मिश्रण कर, मार्मिक प्रस्फुटन और सम्प्रेषण करना सिर्फ बिरला ही कर पाता है। उनकी कृतियाँ लोगों की आत्मा में रम गयीं हैं क्यूंकि हिमालय की बुलन्दी व सागर की गहराई में गुंथी उनकी इन्द्रधनुषी अदायगी, दिव्य अमृत्त का साक्षात्कार है। गहन मंथन करें तो पायेंगे कि उनके गीतों में भाव है, प्रवाह है, पात्र है, एहसास है पर उनकी उपस्थिति के बावजूद, वो “खुद” नहीं हैं। यानि वो मंत्रमुग्ध करने के साथ, हमारे अंतर्मन को ही मुखरित करते हैं।
कोई नहीं जानता कि बीते युग के तानसेन और बैजू कैसा गाते थे, लेकिन उनके अवतार सिर्फ़ विनम्र रफ़ी साहब ही हो सकते थे। वो अकबर के नवरत्न का “दीपक जलाओ, दीपक जलाओ” या बैजू का भजन “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” सूना कर दोनों गायकों को सजीव कर देते हैं. गुणीजन तो रफ़ी साहब को उन दोनों से भी बेहतर मानते हैं क्यूंकि वो स्वर की विविधता और अभिव्यक्ति से अनेकों पात्रों को जीवंत कर देते थे।
संगीतकार चित्रगुप्त के अनुसार सब गायक-गायिकाओं में रचनाकार को संतुष्ट करने की योग्यता थी लेकिन “एकमात्र रफ़ी साहब थे जो अनूठी गायिकी से संगीत रचना को अकल्पनीय सौन्दर्य प्रदान कर देते थे।” रफ़ी साहब की असाधारण क्षमता, संगीतकारों को नए प्रयोग करने को प्रेरित करती थी और संगीतकार जयदेव ने १९८१ में मुझे बताया था कि “कई अमर गीत कभी बन ना पाते और कई अद्वितीय फिल्में बेअसर हो जातीं, अगर रफ़ी साहब ना होते।” इस सन्दर्भ में “प्यासा”, “कागज़ के फूल”, “बैजू बावरा”, “हकीकत”, “मेरे महबूब”, “हम दोनों” और “गाइड” जैसी फिल्मों के नाम ले, वो बोले “उनका ना कोई सानी था और ना आगे होगा क्यूंकि उनको भजन, गीत, गज़ल, कव्वाली, पाश्चात्य, रॉक और विशुद्ध शास्त्रीय संगीत पर समान महारत हासिल थी”। कथन की सच्चाई इससे ज़ाहिर होती है कि किशोर कुमार, मुकेश, तलत महमूद उनके सब से बड़े प्रशंसक थे और मन्ना डे, उन्हें विश्व का सर्वोत्तम गायक मानते थे क्यूंकि “रफ़ी साहब जैसी अभिव्यक्ति, किसी भी गायक-गायिका के लिये नामुमकिन था।”
हर परिस्थिति, परिवेश और चरित्र पे उनकी आवाज़ उपयुक्त बैठती थी क्यूंकि उनके स्वर का भाव, पात्र को पूर्ण करता है. नाद की गहराई समझने वाले जानते है कि क्यूँ मंदिरमस्जिद, धर्म-जाति, प्रांत के झगड़ों से परे, रफी साहब की आवाज़ का जादू अब तक बरकरार है और इसीलिये उनकी आवाज़, परमात्मा की पहचान है तो इंसानियत का सर्वोत्तम प्रतीक भी।
गुलज़ार ने रफ़ी साहब को “संगीत का आठवां स्वर” कहा था और राज कपूर ने “संगीत का बेताज बादशाह”। नौशाद के आंकलन में रफी साहब “हिन्दुस्तान की धड़कन” थे जिसने अपने कौशल और मानवीयता से पूरे जगत को प्रेम के सूत्र में पिरो दिया। भले ही सरकारी तंत्र ने उनकी उपेक्षा की हो लेकिन इसके विपरीत, करोड़ों प्रशंसक उनकी याद में, सैंकड़ों देशों में हर वर्ष, बीस-पच्चीस हज़ार कार्यक्रम आयोजित कर, उन्हें संगीत सम्राट का सम्मान देते हैं। ये प्रकृति का पुरस्कार ही तो है कि हर जगह, हर पल, रफ़ी साहब के गीत गूंजते रहते हैं। मसीहा की तरह, उन्होनें संगीत को जो संबल दिया, लोगों को जो आनंद दिया, उसी कारण वो असंख्य लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। बेशक, रफ़ी साहब दुनिया के एक अनमोल रत्न थे!
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