रंगमंच: दीये की लड़ाई तूफ़ान से

रंगमंच में कलाकार की निकटता से दर्शक विभिन्न भावनाओं और घटनाक्रम में भागीदारी बनता है जिससे उसके अवचेतन में समरसता आ जाती है। जीवन के उतार–चढ़ाव का अहसास सिनेमा और टेलीविजन में भी होता है पर वहां वो एक चमत्कारिक तमाशा होता है जबकि रंगमंच पर, सजीव कलाकारों के बीच, दर्शक को सार्थक भाव शुद्धि का अनुभव होता है जिसे दार्शनिक अरस्तू ने ‘कथारसिस‘ का नाम दिया है। यूनानी नाटकों में इसी सजीवता के कारण इसे यूरोप और दुनिया में लोकप्रियता मिली।

शहीदों के साथ गद्दारी

तेईस मार्च की तारीख एक बार फिर आ गई लेकिन किसी चैनल या रेडियो स्टेशन पर से भगत सिंह, राजगुरु या सुखदेव के सम्मान में कोई एक पंक्ति भी श्रद्धांजलि के रूप में प्रसारित नहीं हुई जब की निकृष्ट और लुंज पुंज से नेताओ के जन्मदिन या पुण्यतिथि पर सारा मीडिया-तंत्र कसीदे पढ़ता रहता है. किसी राजनेता या अभिनेता को भगत सिंह या उसके साथी याद नहीं आये क्योंकि वो शायद बिकने लायक विज्ञापन नहीं हैं और ना ही किसी राजनितिक वोट बैंक का हिस्सा.

हिन्दी की हत्या

सदियों से सर्वविदित है कि भाषा ही घर, समाज और संस्कृति की धुरी है और जीवन के प्रत्येक क्षण को ही नहीं, अवचेतन मन को भी भाषा प्रभावित करती है। भाषा का समुचित ज्ञान, मानव-संवाद के लिए अति आवश्यक है क्यूंकि इससे भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने…

रिश्तों का बाज़ारीकरण

क्या अजीब समय आया है कि इंसानी भावनाओं से ले कर इंसानी रिश्तों तक, हर चीज़ बिकाऊ हो गयी है. यूँ तो पूरा संसार ही आज एक बड़े से बाज़ार में तब्दील हो गया है पर युग परिवर्तन का खेल देखिये, मंडी में रखी सब्ज़ी-तरकारी की तरह,…

नये ज़माने के भिखारी

बड़े शहरों में हर जगह कोई ना कोई भिखारी खड़ा नज़र आता है जिससे पिण्ड छुड़ाना बहुत मुश्किल होता है। लाख कोशिश कीजिये, इनसे पार पाना बहुत कठिन होता क्योंकि रोनी सी सूरत बना, कोई झूठी कहानी गढ़, अपना उल्लू सीधा करना ये खूब जानते हैं।