In the golden era of 1960s, when melody was king, Sadhana’s ethereal beauty lent meaning to many a great song because the lyrics literally symbolised her mesmerising demeanour…

Continue reading →

आम-आदमी बहुत बेअक्ल है तभी तो बूझ ही नहीं पाता कि सरकार चीज़ों के दाम इसलिए नहीं बढ़ाती कि उद्योगपति मुनाफा कमा सकें बल्कि इसलिए कि आम-आदमी समृद्धशाली बन सके।

Continue reading →

19 जुलाई 1969 को जब 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तो सरकार की दलील थी कि उसे मजबूरन ऐसा करना पड़ा क्यूंकि निजी क्षेत्र के बैंक गरीब नागरिकों के हितों को नज़र-अंदाज़ कर रहे थे। इसी नीति के चलते, जब दूसरे चरण में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तो 91 प्रतिशत बैंकिंग उद्योग पर भारत सरकार का नियंत्रण हो गया। द प्रिंट के अनुसार, 2015 तक जहाँ बैंकिंग क्षेत्र के 74 प्रतिशत व्यवसाय पर सरकारी बैंकों का आधिपत्य होता था, वो अब घट कर सिर्फ 59.8 प्रतिशत रह गया है, जबकि निजी बैंकों का हिस्सा बढ़ कर लगभग 34 प्रतिशत हो गया है।  

हालांकि राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार कर, ग्रामीण किसानों को सस्ते वितीय संसाधन उपलब्ध कराना था, लेकिन ये लक्ष्य अब पूरे नहीं किये जा रहे। आज भी ज़्यादातर ग्रामीणवासी बैंक सुविधा से वंचित है और गरीब को आज बैंकों द्वारा दुत्कारा और प्रताड़ित किया जाता है। उसकी ज़रूरतों और सुविधाओं के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक कभी उतने तत्पर नहीं होते जितने की शहरी ग्राहक के लिए, वर्तमान केंद्र सरकार ने तो खैर राष्ट्रीयकृत बैंकों को निजी क्षेत्र को बेचने का इरादा कर रखा है और ऐसा लगता है कि सरकार, अपने कर्तव्य से मुंह मोड़, निजी व्यवसायियों को ग्रामीण साहूकारों की तरह ताकतवर होने का मौका दे रही है। 

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले दो दशकों में वाणिज्यिक बैंकों की ग्रामीण शाखाओं की संख्या में  भारी कमी कर दी गयी। प्रसिद्ध समाज विश्लेषक पी साईनाथ के अनुसार 1993 से 2007 की अवधि के दौरान, औसतन प्रत्येक कार्मिक दिन में एक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक की ग्रामीण शाखा को देश में बंद किया गया, जबकि इसी अवधि में शहरी बैंक शाखाओं की संख्या देश भर में दुगनी से अधिक हो गयी। ये आंकड़े साबित करते हैं की सब सरकारों की कथनी और करनी में अंतर है और गरीबों की चिंता महज़ एक दिखावा। वर्तमान सरकार तो वैसे ही सरकारी बैंकों के स्तर को सुधारने की बजाये पूरी तरह से राष्ट्रीयकृत बैंकों को निजी क्षेत्र को सौंपने की हिमायती है, जिससे देश की अर्थ-व्यवस्था को घातक नुक्सान हो सकता है। सच यही है कि ग्रामीण किसानों और काश्तकारों को जानबूझकर, एक सुनियोजित तरीके से, साहूकारों के शिकंजे में धकेला जा रहा है।

पिछली जनगणना अनुसार 72 फीसदी भारतीय गावों में रहते हैं, पर बैंकों का 92 फीसदी ऋण शहरी और अर्ध शहरी क्षेत्रों को दिया जाता है। आज प्रधानमंत्री आम आदमी को किसी भी प्रकार की राहत को रेवड़ी कह कर खिल्ली उड़ाते हैं तथा किसानो की ऋण माफी की भी बहुत से लोग निंदा करते हैं। पर सरकारी कारिंदे और निजी व्यापार के समर्थक वो भूल जाते हैं की आईडीबीआई और आईऍफ़सीआई जैसे सिर्फ दो संस्थानों द्वारा इससे कहीं गुना ज्यादा औद्योगिक ऋण माफ़ किया जा चुका है। अखबार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार पिछले आठ सालों में, राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा उद्योगपतियों के 10 लाख 72 हज़ार करोड़ रूपये के निजी ऋण को माफ़ कर दिया गया है।

(Indian express: https://indianexpress.com/article/business/banking-and-finance/banks-write-off-rs-2-02-lakh-cr-in-fy21-7669513/)

कितना अजीब है कि उद्योगपतियों की कोठियां बढ़ती जाती हैं पर ऋण माफ़ हो जातें हैं और गरीब आत्महत्या कर रहे हैं, तब भी उनके घरों की नीलामी की जा रही है। आज राष्ट्रीयकृत बैंकों का व्यवहार भी निजी बैंकों जैसा असंवेदनशील हो गया है जहाँ आम आदमी पर ना केवल तमाम नियम कायदे लादे जाते हैं, बल्कि उसके बुनियादी हक़ भी छीन लिये गए हैं। एक आम नागरिक आज राष्ट्रीयकृत बैंक में आसानी से बचत खाता भी नहीं खुलवा सकता तो फिर ऐसे बैंकों का फायदा क्या? क्या सरकारी बैंकों को एक आम आदमी की ज़रूरतों और आकाँक्षाओं का ध्यान नहीं रखना चाहिए, ख़ास कर तब जबकि उसमें भारतवासियों का पैसा लगा हुआ है? क्या सरकारी बैंकों का सामाजिक उत्तरदायित्व देशवासियों, ख़ास कर आम आदमी के प्रति कुछ भी नहीं?

होना तो ये चाहिए कि राष्ट्रीयकृत बैंकों के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाया जाये, उनकी कार्य प्रणाली पारदर्शी बढ़ाई जाती तथा उनमें रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाता। लेकिन इसके विपरीत, जानबूझ कर, हर तरह से राष्ट्रीयकृत बैंकों को कमज़ोर किया जा रहा है, तथा उनके निजीकरण के लिये, उनका शोषण किया जा रहा है। सामाजिक संतुलन और देश की आर्थिक सम्पन्नता के लिये बहुत ज़रूरी है कि सरकारी बैंक मज़बूत किये जाएँ, वर्ना ईस्ट इण्डिया कंपनी की तरह, निजी बैंक व्यवसायी, देश की संपत्ति को दीमक की तरह चाट जायेंगे।

शादी ना करने की ऐसी अद्भुत दलील, शायद एक बिरला इंसान ही अपनी माँ से कर सकता था और बेशक भगत सिंह इतिहास में अपने तरीके का अनोखा व्यक्तित्व था – निडर, सत्यव्रत, कर्तव्य निष्ठ, निष्काम कर्मयोगी। एक ऐसा योद्धा था जिसका कोई सानी नहीं था और आज 91 साल बाद भी उसकी तरह का दूसरा इंसान ढूंढे नहीं मिलता। तेईस साल की मासूम उम्र में भारत की आजादी के लिए उसने जो हँसते – हँसते कुर्बानी दी, उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। पर अफ़सोस, कि हम करोडो भारतवासी उन परमवीरों की शहादत को याद नहीं करते जिनके लहू से आज हमारा समाज जीवित है।

“तू ना रो माँ कि तू है भगत सिंह की माँ, मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं
घोड़ी चढ़ के तो लाते हैं दुल्हन सभी, हँस के हर कोई फांसी चढ़ेगा नहीं।।”

तेईस मार्च की तारीख एक बार फिर आ गई लेकिन किसी चैनल या रेडियो स्टेशन पर से भगत सिंह, राजगुरु या सुखदेव के सम्मान में कोई एक पंक्ति भी श्रधान्जली के रूप में प्रसारित नहीं हुई जब की निकृष्ट और लुंज पुंज से नेताओ के जन्मदिन या पुण्यतिथी पर सारा मीडिया तंत्र कसीदे पढता रहता है। किसी राजनेता या अभिनेता को भगत सिंह या उसके साथी याद नहीं आये क्योंकि वो शायद आज बिकने लायक सामग्री या विज्ञापन नहीं हैं और ना ही किसी राजनितिक वोट बैंक का हिस्सा। मुझे लगता है कि वो शायर बहुत मासूम थे जो समझते थे की शहीदों की बरसी पर लोग कृतज्ञता स्वरूप, हजारों की संख्या में उनकी मजारों पर मेले लगाएंगे। पर आईपीएल, डांस, फिल्म, फैशन, नफरत और हिंसा में लिप्त देशवासीयों को इतनी फुर्सत कहाँ की वो किसी शहीद को याद करें?

राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के लिए ये शहीद इसलिए मायने नहीं रखते क्योंकि अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर इनकी याद में कोई सेमिनार आयोजित नहीं होता। नेताओं को नोटों की मालाओं से फुर्सत नहीं है और जब जनता सेंसेक्स की सुई से ही देश की प्रगति नाप कर खुश हो रही है, तब शहीदों की फिक्र भला कौन करे? कितना भोला था भगत सिंह जिसने देशवासीयों को अपनी मृत्यु पर रोने या शोक करने से मना किया था पर उसका एक आग्रह भी था जिसे करोड़ो की भीड़ ने भुला दिया। भगत सिंह का आग्रह था :

“जब शहीदों की अर्थी उठे धूम से,
देश वालों तुम आंसू बहाना नहीं,
पर मनाओ जब आज़ाद भारत का दिन
उस घड़ी हमें भूल जाना नहीं,
लौट कर आ सके ना जहाँ में तो क्या,
याद बन कर दिलों में तो आ जायेंगे।।”

भगत सिंह सरीखे देश भक्तों ने तो अपने वचन निभा दिए पर क्या हम उनके साथ गददारी नहीं कर रहे कि उनके एहसानों को हम याद तक नहीं करते? याद करना तो दूर, हम देश को बांटने का काम कर रहे हैं। बहुत से लोग आज हर पल देश में नफरत की आग सुलगा रहे हैं जब कि वो नहीं जानते कि इस आग के शोलों में उनके बच्चों की मौत निश्चित है।

चौंकाने वाली बात ये है कि हमारे देश की भूख, प्यास और गरीबी के बारे में सरकार या पूंजीपति तो पहले से ही बेफिक्र हैं पर आम नागरिक भी, कोरोना की महामारी और वितीय तकलीफों के बावजूद, जातिवाद, धर्म और नफरत की फसल क्यूँ बो रहा है, ये समझ से परे है। कुछ ही लोग हैं जो भगत सिंह के आदर्शों पर चल, इंसान बन देश को बचाने में लगे हैं वर्ना भारत में आजकल सिर्फ नफरत का बाज़ार पनप रहा है जिसमें सेहत, शिक्षा और विकास की उपलब्धियां हासिल करने की बजाये, हर जगह राजनेता, फिल्म अभिनेता, खिलाड़ी और पूंजीपति के भौंडे, धार्मिक प्रदर्शनों में लिप्त हैं।

सच में भगत सिंह सरीखे हजारों शहीदों के साथ हमने धोखा किया है। बात देशभक्ति की होती है और लोग पूजा करते हैं सिर्फ पैसे और नफरत की। ऐ भगत सिंह, हमें माफ़ करना, हम तेरे लायक नहीं हैं। अंग्रेजों ने सिर्फ तुझे फांसी दी थी, लेकिन हमने तेरे आदर्शो की हत्या की है। बड़े दुःख के साथ कबूल करता हूँ कि भारत में अब ज़्यादातर नागरिक, सांप्रदायिक संकीर्णता से ग्रस्त हैं, देशद्रोही हैं और इसलिए माफ़ी मांगता हूँ कि:

“कोई सीखा नहीं तुझ से, वतन तेरा मिट रहा है,
नफरत की फिज़ा में आज मेरा दम घुट रहा है।।”

संसार के अनमोल रत्न: रफ़ी साहब 

ये तो सर्वविदित है कि स्वर्गीय मोहम्मद रफ़ी के चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है पर जिस तरह करोड़ों लोग आज भी गायिकी के बादशाह के प्रति प्रेम और सम्मान दर्शाते हैं, वो एक चमत्कार सा लगता है। ये इसलिये क्यूंकि आज जब नामचीन सितारों और नेताओं के लिए आदर भाव नहीं है और धुरंधर गायक-गायिकाओं को उनके जीवन काल में ही भुला दिया गया है, ऐसे में रफ़ी साहब के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा को एक अपवाद ही कहा जा सकता है। बेशक परमात्मा के इस वरदान के पीछे कुछ खास कारण ज़रूर होंगे जिनकी वजह से मंदिर-मस्जिद, जात-पात के झगड़ों से परे, तमाम लोग रफ़ी साहब को एक अलग मुकाम पे रख, भक्ति भाव से पूजते हैं और उन्हें परमात्मा की आवाज़ मानते हैं।

आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, दुनिया में पीर-पैगम्बर, संत और मसीहा निश्छल, निष्कपट, सरल इंसान होते हैं और चूंकि उनका प्रत्येक कर्म मानव सेवा को समर्पित होता है, इसलिये उनके संसर्ग में आने वालों को हमेशा एक आलौकिक अनुभूति होती है। सात दशकों से अगर रफ़ी साहब सब के चहेते हैं और लोगों ने उनके गीतों को आत्मसात किया हुआ है तो वो इसलिये कि रफ़ी साहब ने एक संत की भांति, प्रत्येक रचना को इतनी तन्मयता से गाया कि उनकी इमानदारी, उनकी सुरीली आवाज़ में घुल कर, आलौकिक आनंद पैदा करती है। निसंदेह, दुनिया भर में उनके गीतों का जादू बरकरार है तो इसका श्रेय उनके पवित्र और समर्पित गायन को जाता है जिसे सुन हरेक श्रोता को एक दिव्य अनुभूति होती है। 

गुणीजन मानते हैं कि रफ़ी साहब की आवाज़ में ईश्वर का प्यार बरसता है क्यूंकि वो उत्कृष्ट कलाकार के साथ-साथ, बहुत अच्छे इंसान थे। अहंकार, लोभ, द्वेष या राजनीति से सर्वथा अछूते इस कलाकार ने बहुतेरे संगीतकारों – निर्माताओं को स्थापित करने के लिये सैंकड़ों गीत मुफ्त गा दिए और अनेकों कलाकारों की चुपचाप आर्थिक मदद की क्यूंकि गायिकी उनका धर्म-ईमान था। इसी वजह से उनकी आवाज़ ईश्वर की करुणा से झंकृत है जिसमें एक और जहाँ चांदनी की शीतलता है तो बिजली की थिरकन भी, ओस की निर्मलता है तो सौंधी-सौंधी हवा की रूहानी ताकत और शोखी भी, हिमालय की बुलंदी और सागर की गहराई में गुंथी इस आवाज़ की मखमली अदायगी एक तरह से दिव्य अमृत का साक्षात्कार ही है।

संगीतकार खय्याम बताते हैं कि “ताउम्र रफ़ी साहब ने हरेक संगीतकार की रचना की बारीकियों को एक विद्यार्थी की तरह सीखा और फिर गाया” और इसीलिये उनके सुर झरने के पानी की तरह साफ, निर्मल और मीठे बहते थे। मानव मन की परतों को रफ़ी साहब एक मनीषी की तरह समझते थे और इसीलिये उनके गीतों में भाव है, प्रवाह है, पात्र है, सहजता है और उनकी आवाज़ आत्मा में घर कर जाती है। आप ध्यान देंगे तो पायेंगे रफ़ी साहब की आवाज़ में गज़ब की अभिनय क्षमता है और उसमें हर रंग, हर भाव, हर अदा का समावेश है, इसीलिये किसी भी चरित्र पर उनकी आवाज़ थोपी हुई नहीं लगती है। अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण, बूढ़ा-जवान, चंचल-गंभीर व्यक्तित्व से लेकर सैनिक हो या किसान, मजदूर हो या बाबू, सब के लिये रफ़ी साहब की आवाज़ उपयुक्त है क्यूंकि उसमें योगेश्वर का सम्पूर्ण भाव बरसता है।

गाना रूमानी हो या दर्दीला, मिलन का हो या विछोह का, घुमावदार कठिन तान हो या ग़ज़ल की कोमलता, कव्वाली का जोश हो या प्रणय का उन्माद, परमेश्वर की उपासना हो या देश प्रेम की सुलगती ज्वाला, रफ़ी साहब शायर-गीतकार के उद्गारों को अपने अनूठे अंदाज़ में रूह बख्श देते थे। उनकी आवाज़ की विविधता, व्यापकता, मिठास, सोज़, कशिश और लोच के कारण ही रफ़ी साहब के लिये संगीतकारों ने तीन सप्तक के गीत सृजित किये जबकि पहले ज़्यादातर गीत एक सप्तक तक सीमित रहते थे। उनके समकालीन गायक-गायिकायें जानते थे कि शब्दों के उच्चारण और भावों को संगीतमय अभिव्यक्ती देने में वो अपनी तरह के अकेले गायक थे और कोई अचरज नहीं कि मन्ना डे सरीखे उत्तम कलाकार ने रफ़ी साहब को सारे गायक-गायिकाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है क्यूंकि स्वरों को श्रोताओं की आत्मा में तस्वीर की तरह उतार देने की असाधारण कला सिर्फ रफ़ी साहब ही जानते थे। संगीतकार जयदेव ने भी 1981 में मुझे कहा था कि नौशाद, सचिन देव बर्मन, शंकर-जयकिशन और ओ. पी. नैय्यर, रफ़ी साहब को रेंज, सोज़, विविधता और भाव-अभिव्यक्ति के मामले में सभी गायक-गायिकाओं में सर्वोच्च कलाकार मानते थे। 

मन्ना डे का गंभीर विश्लेषण वाकई सही है क्यूंकि मुकेश जहाँ दर्दीले गीतों के गायक थे तो तलत महमूद नर्मों नाज़ुक ग़ज़लों के माहिर, खुद मन्ना डे ज़्यादातर शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों से जुड़े रहे तो किशोर कुमार हलके-फुल्के, चंचल गीतों के लिये ही जाने गये। आप ध्यान करेंगे तो पायेंगे कि किशोर कुमार को किसी संगीतकार ने कभी कोई भजन, ग़ज़ल, कव्वाली या राष्ट्र भक्ती का गीत गाने को नहीं दिया ठीक जिस प्रकार मन्ना डे को ज़्यादातर पाश्चात्य स्वर लहरियों से दूर रखा गया क्यूंकि उनकी आवाजों की कुछ सीमाएं थीं। और तो और, रफ़ी साहब की असाधारण क्षमता के कारण ही जब किसी एक ही गीत को स्त्री-पुरुष स्वरों में अलग-अलग रिकॉर्ड किया गया तो लता मंगेशकर, आशा भोंसले और सुमन कल्यानपुर के बजाये, रफ़ी साहब के गाये संस्करण जनता में हमेशा ज़्यादा मशहूर हुए। 

अक्सर शोहरत की बुलंदियों पे बैठे लोगों की शान में झूठी तारीफें की जाती हैं पर असली प्रशंसा वो ही होती है जो आपके प्रतिद्वंदीयों, सह-कर्मियों या सेवकों द्वारा की जाती है। रफ़ी साहब की मृत्यु पर गायक तलत महमूद ने रुंधे गले से कहा था “काश, अल्लाह-ताला मेरी जान ले लेता और रफ़ी साहब की जान बख्श देता क्यूंकि दुनिया को उनकी बहुत ज़रूरत थी” ; शायद इससे बड़ा सम्मान और श्रृद्धांजलि किसी भी इंसान के लिये अभिव्यक्त नहीं की जा सकती। अदाकार दिलीप कुमार फरमाते थे कि बेपनाह प्रसिद्धी के बावजूद, रफ़ी साहब इंसानियत की मिसाल रहे और “माईक के अलावा, हमेशा इतने नम्र स्वर में बोलते थे कि सुनना मुश्किल होता था। चालीस साल के उनके फ़िल्मी सफर में कभी किसी ने उनको किसी से कोई अभद्र व्यवहार करते नहीं देखा और मैंने किसी के मुख से रफ़ी साहब के बारे में कोई अपशब्द नहीं सुना”। 

संगीतकार नौशाद के अनुसार रफ़ी साहब पर संगीत कला को अभिमान था क्यूंकि “सुनी सबने मोहब्बत की जुबां आवाज़ में तेरी, धड़कता है दिले हिन्दोस्तां आवाज़ में तेरी”, पर अफ़सोस, “हिन्दुस्तान की धडकन” को सरकारी तंत्र ने भारत रत्न से नहीं नवाजा क्यूंकि रफ़ी साहब कभी किसी राजनीतिक पार्टी या प्रान्त विशेष के मोहरे नहीं बने और उन्होनें किसी नेता की प्रशंसा के कसीदे नहीं पढ़े। जिस बिरले कलाकार ने अपनी कला से दुनिया को प्रेम और एकता के सूत्र में पिरो दिया, उसे भारत रत्न नहीं देना क्या करोडो लोगों के साथ अन्याय नहीं है? अजीब बात ये है कि संगीत जगत में जिसका कोई सानी नहीं था, जिसको भजन, गीत, ग़ज़ल, कव्वाली, पाश्चात्य और शास्त्रीय संगीत पर सामान महारत हासिल थी, उससे ज़्यादा सरकारी पुरूस्कार बहुतेरे छुटभैय्यों को दे दिए गये जबकि रफ़ी साहब भारतीय संस्कृति के सर्वधर्म समभाव और इंसानियत के सर्वोत्तम प्रतीक थे। 

पर इससे क्या फर्क पड़ता है क्यूंकि सरकारों की बेरुखी के बावजूद, ईश्वर ने असंख्य लोगों के हृदय में रफ़ी साहब को चिर स्थापित कर रखा है और धर्म, जाति, राष्ट्र और भाषा से परे, रफ़ी साहब दुनिया भर के दिलों पर राज कर रहे हैं। इन्टरनेट गवाह है कि अपार संख्या में क्यूँ विदेशी उनके दीवाने हैं और क्यूँ संसार में हर पल, उनके गीत बजते रहते हैं। शायद यही ईश्वर का वरदान है, सबसे बड़ा पुरूस्कार है और इंसानियत की जीत भी क्यूंकि महल हो या झोंपड़ा, हर जगह रफ़ी साहब के ही गीत गूँज रहे हैं।

मुझे याद है बांद्रा के गुरु नानक पार्क में स्थित उनके घर में एक सूक्ती लटकी रहती थी जिस पर लिखा था: “जितना झुकेगा जो उतना उरोज पायेगा, ईमान है जिस दिल में वो बुलंदी पर जाएगा”, यथार्थ में रफ़ी साहब अक्षरक्ष उस सूक्ति को जीते रहे और कोई शक नहीं क्यूँ कुछ वर्ष पूर्व एक सिने पत्रिका द्वारा कराये गये सर्वेक्षण में रफ़ी साहब को फिल्म उद्योग का सबसे लोकप्रिय कलाकार चुना गया।