आज मेरी माँ का 93वाँ जन्मदिन और रफ़ी साहब की 45वीं पुण्यतिथि है। अपनी कम होती याददाश्त के बावजूद, माँ को कुछ बातें साफ़-साफ़ याद हैं और वे ज़ोर देकर कहती हैं: “रफ़ी साहब के गाने लगाओ, रफ़ी साहब सबसे अच्छा गाते हैं”। और जब जब उनका पसंदीदा गाना, “सुहानी रात ढल चुकी” बजता है, तो वे बिल्कुल सुर में गाती हैं, हर शब्द उन्हें साफ़ याद रहता है। क्या रफ़ी साहब की महानता के बारे में मुझे और कुछ कहने की ज़रूरत है? मेरी प्यारी माँ और पिताजी की तरह, रफ़ी साहब भी मेरी आत्मा में एक ख़ास मुकाम रखते हैं। कुछ स्मृतियाँ स्नेह सहित बाँट रहा हूँ।
पिछले कई सालों से मैंने रफ़ी साहब के बारे में अपने जज्बातों का ज़िक्र किया है पर आज उनकी पुण्यतिथी पर मैं आपके साथ बाटूंगा कुछ जाने अनजाने लोगों के विचार जो मेरे पास रिकॉर्ड कर, सहेज कर रखे हुए हैं । ये संवेदनशील बातें करते हुए कई दफा मैंने लोगों को हँसते-रोते देखा, बड़े बुजुर्गों और रोबदार व्यक्तियों को भावुक होते हुए देखा और ये जाना कि एक आम इंसान के दिल के कितने करीब हैं रफ़ी साहब, ये बातें सिर्फ अपने देश की सीमा तक ही सीमित हों ऐसा कतई नहीं है, बल्कि कई बार विदेशियों या फिर विदेशों में भी अजीब अनुभव हुए और रफ़ी साहब की तारीफ के कारण भारतीय होने पर गर्व हुआ।
कुछ साल पहले की बात है, वर्ल्ड प्रेस रिव्यू के सम्पादक एलिजाह ज़र्वान के एक प्रशंसा पत्र के जवाब में मैंने उन्हें ईमेल द्वारा धन्यवाद देते हुए लिखा कि आपकी तारीफ के बदले, मैं आपको हमारे प्रसिद्ध गायक रफ़ी साहब की एक गानों की सीडी बना कर भेजूंगा। चंद मिनट बाद ही उनका जवाब आया, “मैं इस समय ईजिप्ट की राजधानी कैरों के एक कैफे मैं बैठा हुआ रफ़ी साहब के गाने सुन रहा हूँ। और आपको बता दूँ की मैं उनका बहुत पुराना प्रशंसक हूँ तथा अमरीका मैं भी कई वर्षों से उनके गीत सुन रहा हूँ हालांकि मुझे हिंदी नहीं आती।” क्या कहूँ मैं तो बस निहाल हो गया।
लगभग ऐसा ही वाक्या एक और अँगरेज़ दोस्त, जो न्यूज़ीलैण्ड के ऑकलैंड शहर में रहते हैं, के साथ हुआ। उन्हें जयपुर आने के निमंत्रण के संग मैंने चूरमा दाल बाटी और रफ़ी साहब की प्रशंसा लिख भेजी और कहा में आपको उनके गीत सुनवाऊंगा। तुरंत जवाब आया कि “चूरमा दाल बाटी भले ही ना खिलाना पर रफ़ी साहब के गीत ज़रूर सुनवाना क्यूंकि मैं उनका दीवाना हूँ!” जनाब लन्दन में रह चुके थे और रफ़ी साहब के अंधभक्त थे।
1980 के दशक में आईडीबीआई में एक ज़बरदस्त मुख्य प्रबंधक हुआ करते थे श्री. एस. एच. पाटिल जिनका लोहा सभी मानते थे। निर्भीक व फक्कड़ स्वभाव वाले पाटिल साहब चतुर्थ श्रेणी से निकल कर मुख्य प्रबंधक बने थे और ज़िंदगी की तकलीफों से खासे रूबरू हो चुके थे। मुझ से स्नेह रखते थे और अक्सर दोपहर की चाय हम संग-संग पीते थे जहां अक्सर वो मुझे रफ़ी साहब के गीत गुनगुनाने की फरमाइश करते थे। एक दिन मेरे से बोले, “तू जानता नहीं जिसके तू गीत गाता है वो कितना महान इंसान था” और फिर उन्होनें जो दास्ताँ सुनाई वो इस प्रकार थी। 1957 की बात है जब एक गीत की रिकॉर्डिंग के बाद रफ़ी साहब स्टुडियो से बाहर आए तो देखा मूसलाधार बरसात पड़ रही थी। वो अपनी गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे कि अचानक उनकी नज़र एक संगीत वादक पर पड़ी जिसका चेहरा बुझा हुआ था। उसके पास जा कर बातचीत से उन्हें पता लगा कि उसका बदन बुखार में तप रहा था। रफ़ी साहब ने ये देख उसे अपनी गाडी में बैठने को कहा और उसकी तमाम ना नुकुर को अनदेखा कर, वो उसे उसकी झोपड़ पट्टी में छोड़ने ले गये। झोपड़ पट्टी पहुचने पर जब लोगों नें उनसे चाय पीने का आग्रह किया तो वो फट मान गये और सबके बीच, जहाँ पाटिल साहब भी शामिल थे, बैठ चाय पी डाली।
जब रफ़ी साहब चलने लगे तो कुछ बड़े-बुज़ुर्गों ने उन्हें गणेश चतुर्थी का निमंत्रण दे डाला और उन्होनें हाँ भर दी। अगले कुछ हफ्ते हर कोई उस संगतकार को रफी साहब को गणेश चतुर्थी के निमंत्रण की याद दिलाने को कहता। लेकिन रफी साहब की शख्सियत को देख वो कभी कुछ कह नहीं पाया, हालांकि चौल के रहने वालों को वो यही कहता कि मैंने रफी साहब को दिन – तारीख नोट करा दी है। गणेश चतुर्थी वाली सुबह वो संगतकार खासा परेशान था कि रफी साहब नहीं आएंगे तो वो बस्ती वालों को क्या जवाब देगा। वो उसी उधेड़ बुन में था कि झोपड़ पट्टी में जोरदार करतल ध्वनि हुई और ढ़ोल नगाड़े बजने लगे। वो बाहर आया तो ये देख हैरान हुआ कि रफ़ी साहब गणेश चतुर्थी नहीं भूले थे। यही नहीं वो अपने साथ, लड्डू का टोकरा ले कर आए थे और फिर वहाँ सबके बीच बैठ, लोगों के अनुरोध पर कुछ भजन सुना कर, सब को मदमस्त कर दिया। पाटिल साहब के अनुसार रफ़ी साहब का व्यवहार इतना सरल और सच्चा था कि सब निहाल हो गये और उस अनुभव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया।
रफ़ी साहब कितने महान व्यक्ती थे ये लता मंगेशकर द्वारा दिए गये एक साक्षात्कार से भी उजागर होता है। द हिन्दू अखबार में लता मंगेशकर ने रफ़ी साहब को याद कर कहा था कि उन्होनें “रफ़ी साहब जितना विनम्र, सुशील और सज्जन कलाकार नहीं देखा।” उन्होनें कहा कि “रफ़ी साहब ना केवल सर्वश्रेष्ठ गायक थे बल्कि उनकी गायकी की विविधता और विस्तार खुद उनके, आशा, मन्ना डे और किशोर कुमार से कहीं ज्यादा था पर उन्होनें उसका कभी कोई घमंड नहीं किया”।
कई बरस पहले, प्रसिद्ध संगीतकार जयदेव ने स्वयं मुझ से कहा था कि सचिन देव बर्मन, नौशाद, रवि और ओ पी नैय्यर की नज़र में सभी गायक-गायिकाओं में रफ़ी साहब सर्वोत्तम थे क्यूंकि वो हर प्रकार का गीत, ग़ज़ल, भजन, ठुमरी, पॉप या शास्त्रीय नग्में अपार विविधता और सहजता के साथ गा सकते थे। मन्ना डे तो अनेक बार विभिन्न मंचों पर सब गाने वालों में रफ़ी साहब को सर्वश्रेष्ठ बता ही चुके हैं।
रफ़ी साहब लोगों द्वारा कभी भुलाये नहीं गये, हमेशा हमारे दिल, दिमाग, तस्सवुर में छाये रहे। हालांकि उनके बिछड़ने का गम बेहद तकलीफ देता है, तदापि हर तरफ, हर समय उनकी तिलस्मी आवाज़ का जादू बरकरार है। उनकी आवाज़ का माधुर्य ही है जिसके कारण दुनिया की दी हुई वेदनाओं की तीव्रता कम हो जाती है।
