राष्ट्रीयकृत बैंक का सुनियोजित शोषण

19 जुलाई 1969 को जब 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तो सरकार की दलील थी कि उसे मजबूरन ऐसा करना पड़ा क्यूंकि निजी क्षेत्र के बैंक गरीब नागरिकों के हितों को नज़र-अंदाज़ कर रहे थे। इसी नीति के चलते, जब दूसरे चरण…

रिश्तों का बाज़ारीकरण

क्या अजीब समय आया है कि इंसानी भावनाओं से ले कर इंसानी रिश्तों तक, हर चीज़ बिकाऊ हो गयी है. यूँ तो पूरा संसार ही आज एक बड़े से बाज़ार में तब्दील हो गया है पर युग परिवर्तन का खेल देखिये, मंडी में रखी सब्ज़ी-तरकारी की तरह,…

नये ज़माने के भिखारी

बड़े शहरों में हर जगह कोई ना कोई भिखारी खड़ा नज़र आता है जिससे पिण्ड छुड़ाना बहुत मुश्किल होता है। लाख कोशिश कीजिये, इनसे पार पाना बहुत कठिन होता क्योंकि रोनी सी सूरत बना, कोई झूठी कहानी गढ़, अपना उल्लू सीधा करना ये खूब जानते हैं।

True Wealth

I am sometimes amazed at people’s desperate attempts to gain riches, power and fame at any cost. While there is nothing wrong with making money, acquiring power or seeking recognition, what galls me is the overriding effort to attain them at the cost of health,…

जन्मदिन विशेष सस्नेह 

संसार के अनमोल रत्न: रफ़ी साहब  ये तो सर्वविदित है कि स्वर्गीय मोहम्मद रफ़ी के चाहने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है पर जिस तरह करोड़ों लोग आज भी गायिकी के बादशाह के प्रति प्रेम और सम्मान दर्शाते हैं, वो एक चमत्कार सा लगता है। ये…