हिन्दी की हत्या

सदियों से सर्वविदित है कि भाषा ही घर, समाज और संस्कृति की धुरी है और जीवन के प्रत्येक क्षण को ही नहीं, अवचेतन मन को भी भाषा प्रभावित करती है। भाषा का समुचित ज्ञान, मानव-संवाद के लिए अति आवश्यक है क्यूंकि इससे भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने…

Simply Divine

In the golden era of 1960s, when melody was king, Sadhana’s ethereal beauty lent meaning to many a great song because the lyrics literally symbolised her mesmerising demeanour…

आम आदमी है नासमझ

आम-आदमी बहुत बेअक्ल है तभी तो बूझ ही नहीं पाता कि सरकार चीज़ों के दाम इसलिए नहीं बढ़ाती कि उद्योगपति मुनाफा कमा सकें बल्कि इसलिए कि आम-आदमी समृद्धशाली बन सके।

राष्ट्रीयकृत बैंक का सुनियोजित शोषण

19 जुलाई 1969 को जब 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तो सरकार की दलील थी कि उसे मजबूरन ऐसा करना पड़ा क्यूंकि निजी क्षेत्र के बैंक गरीब नागरिकों के हितों को नज़र-अंदाज़ कर रहे थे। इसी नीति के चलते, जब दूसरे चरण…

रिश्तों का बाज़ारीकरण

क्या अजीब समय आया है कि इंसानी भावनाओं से ले कर इंसानी रिश्तों तक, हर चीज़ बिकाऊ हो गयी है. यूँ तो पूरा संसार ही आज एक बड़े से बाज़ार में तब्दील हो गया है पर युग परिवर्तन का खेल देखिये, मंडी में रखी सब्ज़ी-तरकारी की तरह,…